जिस- जिस से पाया है,
उनको मैं जानती हूँ।
जिन दरों पर सर झुकाया,
उनको पहचानती हूँ
इससे परे भी होगी दुनिया
जीवन , विश्वास , आस्था , मूल्य
मैं उनको नहीं जानती
और मेरे इस न जानने से
कहीं कुछ भी कम नहीं होता
न मेरे लिए
न उनके लिए
जीवन वही और उतना ही है
जितना अनुभवों से बना है।
अनुभव (२)
मेरे अनुभवों का संसार
कितना बड़ा या छोटा है
उससे तुम्हें क्या?
उसकी सुंदरता - कुरूपता
गहराई या भिन्नता
कुछ भी मायने रखती क्या
अगर उससे उपजा सच
यूँ शब्दों में ढलकर
तुमतक न पहुँचता??

4 comments:
Priy Ashok,
Ila ji ki dono kavitayen mahatvapurna hain. Niche ki pankiyon mein jeevan kitana bada sach samahit hai.
जीवन वही और उतना ही है
जितना अनुभवों से बना है।
Dono ko badhai.
Chandel
ILA KEWAL ACHCHHEE KAHANIKAR NAHIN
BALKI ACHCHHE KAVYITRI BHEE HAIN.
UNKEE DONO KAVITAYEN UNKE ANUBHAV
SE UPJEE HAIN.BHAVABHIVYAKTI SARAS
AUR SUNDAR HAI.BADHAAEE.
इला प्रसाद उन कवयित्रियों में से हैं जो बिना किसी ताम झाम या वाद विवाद के अपनी बात सरल और सादे शब्दों में कहने में विश्वास रखती हैं।
उनकी पंक्तियां -
इससे परे भी होगी दुनिया
जीवन , विश्वास , आस्था , मूल्य
मैं उनको नहीं जानती
एक पूरे फ़लसफ़े को प्रस्तुत करती हैं। हममें से बहुत से लोग पूरी शिद्दत से किसी ऐसी दुनिया (जन्नत) का ज़िक्र करते हैं जिसे हम बिल्कुल नहीं जानते। आपको और इला जी को बधाई।
तेजेन्द्र शर्मा
इला एक अच्छी कहानीकार तो हैं ही, पर उनकी कविताएँ भी बहुत गहराई लिए हुए होती हैं.
जीवन वही और उतना ही है
जितना अनुभवों से बना है।
बधाई.
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