Thursday, 1 October 2009

अशोक आंद्रे


कविताएँ

(१)

उम्मीद

जिस भूखण्ड से अभी - अभी
रथ निकला था सरपट
वहां पेड़ों के झुंड खड़े थे शांत,
नंगा कर गए थे उन पेड़ों को
हवा के बगुले
मई के महीने में.
पोखर में वहीं,
मछली का शिशु
टटोलने लगता है मां के शरीर को.
मां देखती है आकाश
और समय दुबक जाता है झाड़ियॊ के पीछे
तभी चील के डैनों तले छिपा
शाम का धुंधलका
उसकी आंखों में छोड़ जाता है कुछ अंधेरा
पीछे खड़ा बगुला चोंच में दबोचे.
उसके शिशु की
देह और आत्मा के बीच के
शून्य को निगल जाता है
और मां फिर से
टटोलने लगती है अपने पेट को
.
(२)

तरीका

मुर्दे हड़ताल पर चले गए हैं
पास बहती नदी ठिठक कर
खड़ी हो गई है!
यह श्मशान का दृश्य है.
चांडाल,
आग को जेब में छिपाए
मन ही मन बुदबुदाने का ढोंग करता -
मंत्र पढ़ने लगा है,
अवैध-अनौतिक पैसा ऎंठने का
शायद यह भी एक तरीका हो!

(३)

तथाकथित नारी

निष्प्राण हो जाती है
मूर्ति की तरह तथाकथित नारी
जबकि तूफान घेरता है उसके मन को,
यह इतिहास नहीं/जहां
कहानियों को सहेज कर रखा गया हो....
एक-एक परत को
उघाड़ा गया है दराती-कुदालों से,
ताकि उसकी तमाम कहानियों की गुफ़ा में
झांका जा सके,
ताकि उन कहानियों में दफ़्न
मृत आत्माओं की शांति के लिए
कुछ प्रार्थनाओं को मूर्त रूप दिया जा सके,
उस निष्प्राण होती मूर्ति के चारों ओर
जहां अंधेरा ज़रूर धंस गया है,
आखिर कला की अपराजेयता की धुंध तो
छंटनी ही चाहिए न,
ताकि मनुष्य के प्रयोजनों का विस्तार हो सके.
कई बार घनीभूत यात्राएं उसकी
संभोग से समायोजन करने तक
आदमी, कितनी आत्माओं का
राजतिलक करता रहता है
हो सकता है यह उसके
विजयपथ की दुंदुभि हो,

लेकिन नारी का विश्वास मरता नहीं
धुंए से ढंकती महाशून्य की शुभ्रता को
आंचल में छिपा लेती है
समय सवाल नहीं करता उस वक्त
उस खंडित मूर्ति पर होते परिहासों पर
शायद शिल्पियों की निःसंगता की वेदना
पार लगाने के लिए ही तो इस तरह
कालजयी होने की उपाधि से सुशोभित
किया जाता है उसे,
आखिर काल का यह नाटक किस मंच
की देन हो सकता है ,
आखि़र नारी तो नारी ही है न,
मनुष्य की कर्मस्थली का विस्तार तो नहीं न,
मूर्ति तो उसके कर्म की आख्याओं का
प्रतिरूप भर है
तभी तो उसका आवा से गमन तक का सफ़र
जारी है आज भी,
इसीलिए उसकी कथाएं ज़रूर गुंजायमान हैं
शायद यही उसका प्राण है युगान्तक के लिए
जो धधकता है मनुष्य की देह में
अनंतता के लिए.

(४)

पता जिस्म का

एक जिस्म टटोलता है
मेरे अंदर तहखाने में छिपे, कुछ जज़्बात
जिनकी क़ीमत
समय ने अपने पांवों तले दबा रखी है
उस जिस्म़ की दो आंखें एकटक
दाग़ती हैं कुछ सवालों के गोले
जिन्हें मेरी गर्म सांसें धुंआ-धुंआ करती हैं
उनकी नाक सूघंती है
मेरे आसपास के माहौल को
जिसका पता मेरे पास भी नहीं है.
उसके होंठ कुछ पूछने को
हिलते हैं आगाह करने के लिए
उसके कान मना कर देते हैं सुनने को,
मैं उस जिस्म़ की खुदाई करता हूं,
और खाली समय में ढूंढता हूं
अपने रोपे बीज को,
जो अंधेरे में पकड़ लेता है मेरा गला
पाता हूं कि वह और कोई नहीं,
मेरे ही जिस्म़ का पता है
जहां से एक नए सफ़र का दिया
टिटिमा रहा है

(५)

आंतरिक सुकून के लिए

एक पर्वत से दूसरे पर्वत की ओर
जाता हुआ व्यक्ति/कई बार फ़िसल कर
शैवाल की नमी को छूने लगता है.
जीवन खिलने की कोशिश में
आकाश की मुंडेर पर चढ़ने के प्रयास में
अपने ही घर के रोशनदान की आंख को
फोड़ने लगता है

मौत जरूर पीछा करती है जीवात्माओं का
लेकिन जिन्दगी फिर भी पीछा करती है मौत का
सवारी गांठने के लिए,
सवारी करने की अदम्य इच्छा ही व्यक्ति को
उसकी आस्था के झंडे गाड़ने में मदद करती है.
कई बार उसे पूर्वजों द्वारा छोड़े गये,
सबसे श्रेष्ठ शोकगीत को,
गुनगुनाने के लिए लाचार भी होना पड़ता है.
जबकि समुद्र समय की चुप्पी को तोड़ने के लिए
चिघाड़ता है अहर्निष,

आखिर व्यक्ति तो व्यक्ति ही है
इसलिए उसे गीत तो गाने ही पड़ेंगे
चाहे शुरू का हो या फिर/अंतिम यात्रा की बेला का,
क्योंकि कंपन की लय/टिकने नहीं देगी उसे,
जीवन उसे खामोश होने नहीं देगा
उत्तेजित करता रहे चीखने-चिल्लाने के लिए.
उसके आंतरिक सुकून के लिए.

Sunday, 13 September 2009

इला प्रसाद की कविताएँ

अनुभव

जिस- जिस से पाया है,
उनको मैं जानती हूँ।
जिन दरों पर सर झुकाया,
उनको पहचानती हूँ
इससे परे भी होगी दुनिया
जीवन , विश्वास , आस्था , मूल्य
मैं उनको नहीं जानती
और मेरे इस न जानने से
कहीं कुछ भी कम नहीं होता
न मेरे लिए
न उनके लिए
जीवन वही और उतना ही है
जितना अनुभवों से बना है।


अनुभव (२)

मेरे अनुभवों का संसार
कितना बड़ा या छोटा है
उससे तुम्हें क्या?
उसकी सुंदरता - कुरूपता
गहराई या भिन्नता
कुछ भी मायने रखती क्या
अगर उससे उपजा सच
यूँ शब्दों में ढलकर
तुमतक न पहुँचता??



झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।

Monday, 31 August 2009

रूप सिंह चन्देल

कहानी


एक मिनट यार !

“चमन...” आवाज़ गैलरी को लाँघती, दरवाजे को फलाँगती चमन के कानों से टकराई तो मफ़लर से ढंके उसके कान चौकन्ना हो उठे।‘आहूजा आज फिर डांटेगा...कुछ भी नहीं सुनेगा।’ मेज पर तेजी से डस्टर घुमाते चमन के हाथ सरकने लगे।“आज फिर तूने सवा नौ बजा दिए। अभी तक सफाई नहीं हुई? भगवान के लिए फूल सजाने हैं... कब करेगा?” आहूजा के बायें हाथ में नोट शीट का पैड और दाहिने में पेन था। दफ़्तर जाने के साथ ये चीजें एक बार उसके हाथ आतीं तो दफ़्तर बंद होने तक वह उन्हें थामे रहता।“अभी सब हुआ जाता है सर।"“ऐसे नहीं चलेगा। समय से नहीं पहुँच सकता तो बोल, भिजवा दूँ पूना–भुवनेश्वर। करना वहाँ मटरगश्ती।"“मटरगश्ती कैसी सर! आज कोहरा अधिक था। बस अटक गई आई.टी.ओ. पुल पर...।"“रोज का बहाना छोड़। कोहरा उधर से अधिक रहा होगा वसंत कुंज इलाके में... फिर भी मैं कैसे पहुँच गया समय से !” शब्दों को पीसता आहूजा बोला।“सर, आप बस से कहाँ आते हैं। आप तो आटो से...।"“तुझे किसने मना किया है। तू भी आटो से आ।" आहूजा दाहिने हाथ से सिर खुजलाता बोला। ऐसा वह प्राय: करता है।चमन चुप रहा। मेज साफ हो चुकी तो आहूजा बोला, “जल्दी कर... भगवान के पास अगरबत्ती जला और यह ले माला।" पॉलिथीन की थैली में गुलाब की माला बढ़ाता आहूजा बोला, “इसे उस छोटी मेज पर रख दे।"“जी सर !” चमन अगरबत्ती सुलगाने लगा।“और सुन।" चमन आहूजा की ओर देखने लगा।“पानी का जग साफ करके भर ला। गिलास में हल्का गर्म पानी... आज ठंड अधिक है।"“जी सर !”आहूजा पलटा, “आज ससुरा स्वीपर भी नहीं आया। बाथरूम साफ नहीं हो पाया।" सिर खुजलाता वह बुदबुदाया, “क्या-क्या देखूँ !” आहूजा दरवाजे पर ठिठक गया। चमन जग उठाये उसके पीछे ही था कि वह चीखा, “अबे तुझे कितनी बार कहा कि आते ही ब्लोअर चालू कर दिया कर... अगर मैम आ गई...।" आहूजा ने घड़ी देखी, “आने का समय हो रहा है।... अपने साथ मेरी भी छीछालेदर करवाएगा। अब तक कमरा गर्म हो जाना चाहिए था। ऐं... समझ में नहीं आता?”“सॉरी सर, भूल गया था। अभी किए देता हूँ।" आहूजा के चेहरे के भाव देख चमन सकपका गया और ब्लोअर की ओर बढ़ा।“उसे छोड़, दौड़– अच्छी तरह जग साफ कर पानी भर... उसे मैं आन कर दूँगा।" आहूजा ब्लाअर आन करने के लिए बढ़ गया।चमन पानी लेने दौड़ गया तो आहूजा ने कमरे से अटैच मैम के बाथरूम-कम-टॉयलेट का मुआयना किया। प्रसाधन सामग्री देखी। कंघा, लिपिस्टिक, परफ्यूम, क्रीम, सब दुरुस्त... वह आश्वस्त हुआ। उसने टॉवल उलट कर टांगा, टिश्यू-पेपर्स, टॉयलेट सॉप... दुरुस्त पाया उसने।उसे दफ़्तर के चपरासियों पर विश्वास नहीं है। सभी चोर हैं– मैम की लिपिस्टिक उठा लें, परफ्यूम या पाउडर घर ले जाएं। छोटे लोगों की मानसिकता छोटी होती है। एक बार हंगामा हुआ था। मैम को एक सेमिनार में जाना था। लिपिस्टिक और कंघा गायब थे। मैम का पारा सातवें आसमान पर... वह सकपकाया-सहमा रहा। स्टॉफ-कार लग चुकी थी कमरे के बाहर। समय भी न था कि गोल मार्केट से मंगवाता। उस क्षण उसने सोचा था कि मैम के जाते ही वह चमन और स्वीपर की खबर लेगा। लेकिन, तभी मैम को याद आ गया था। पिछले दिन सेमिनार में जाते समय मैम वे चीजें पर्स में डाल कर ले गई थी।चमन और स्वीपर आरोप की गिरफ्त में आने से बच गये थे।कमरे से निकलते चमन ने मन ही मन आहूजा को भद्दी-सी गाली दी और सामने आ रहे सहायक निदेशक अंसारी को तेज आवाज़ में नमस्ते की।अंसारी ठंड से सिकुड़ा हुआ था। चमन की नमस्ते का उत्तर धीमे स्वर में दिया उसने, जिसे चमन नहीं सुन सका।‘यह ज़िन्दगी भी क्या है !’ भुनभुनाता हुआ चमन भाग्य को कोस रहा था।‘दफ़्तर में दूसरे चपरासी भी हैं, लेकिन न आहूजा उन्हें कुछ कहता है और न अंसारी। वे सब कभी भी आते-जाते हैं। लेकिन उनकी गाज मुझ पर ही गिरती है।’चमन सोच रहा था, ‘पता नहीं कौन-से पाप किए थे कि निदेशक के साथ ड्यूटी लगा दी। पाँच साल से एक ही रूटीन! सुबह पाँच बजे से ही दफ़्तर शुरू हो जाता है, बच्चे तक को ढंग से स्कूल के लिए तैयार नहीं कर पाता। पत्नी दुखी है। दुनिया को देखती जो है। पड़ोसी रामभरोसे कभी भी साढ़े आठ बजे से पहले दफ़्तर के लिए घर से नहीं निकलता। शाम छह बजे तक घर वापस। जबकि मैं दफ़्तर से ही साढ़े छह बजे के बाद निकल पाता हूँ। रात साढ़े आठ से पहले घर पहुँचना कठिन है। जबकि रामभरोसे का दफ़्तर मेरे दफ़्तर के पास ही है।’‘कितनी ही बार आहूजा को ड्यूटी बदलने को कहा, लेकिन वह सुने तब न ।’‘आहूजा है तो सेक्सन आफिसर... लेकिन संयुक्त निदेशक राव के बजाय उसका दबदबा अधिक है दफ़्तर में। वह मैम की नाक का बाल बना हुआ है। एक दिन सुधीर बाबू जिक्र कर रहे थे– आहूजा खानदानी है। इसका बाप भी इसी विभाग में था और वह भी बड़े अफसरों के सेवाभाव में रात-दिन एक किए रहता था।’नल पर दूसरे दफ़्तर के चपरासी पहले ही झुके हुए थे।‘आहूजा मुझे कहता है कि वह आटो से आ सकता है... मैं क्यों नहीं। मुझे कह ही देना चाहिए था कि नया फर्नीचर और निदेशक से लेकर दूसरे अधिकारियों के कमरों के लिए कारपेट की खरीद में बीस प्रतिशत कमीशन आहूजा साहब चमन ने नहीं खाया था। दूसरे न जाने कितने काम हैं जिसमें वह कमीशन खाता है।’‘क्या मैम को यह सब पता नहीं। लेकिन, उनके आँखें मूंदे रहने का भी कारण है। मैम के बच्चों से लेकर हसबैंड के लिए दिन-भर दफ़्तर की गाड़ी दौड़ती रहती है। प्रतिदिन लंच दफ़्तर खाते से... घर के दोनों कुत्तों के लिए हफ्ते में तीन दिन गोल मार्केट से मीट आहूजा स्वयं लेने जाता है... अपनी जेब से नहीं...दफ़्तर खाते से। एक कैजुअल लेबर रामखिलावन स्थायी रूप से मैम के घर रहता है, कुत्तों को नहलाने, टहलाने और घर के दूसरे कामों के लिए। सिविल सर्विस से एक वर्ष पूर्व रिटायर्ड मैम के पति की सेवा में दिन-भर दौड़ता रहता है रामखिलावन।’‘रामखिलावन ने एक दिन फुसफुसा कर बताया था– तू नहीं जानता चमन... आहूजा हर दूसरे दिन मैम के बंगले में सुबह आठ बजे पहुँचता है फूल लेकर... ड्राइंग-रूम के लिए। बीस के चालीस वसूलता होगा वह फूलों के- दफ़्तर से।’आहूजा फूलों की एक माला प्रतिदिन दफ़्तर लाता है। मैम के कमरे में भगवान की एक मूर्ति है... एक कोने में... मैम ने लाकर रखी थी। ट्रांसफर पर आयी, तब साथ लायी थीं। दफ़्तर पहुँचते ही मैम पाँच मिनट पूजा करती है– माला पहनाती है। शाम दफ़्तर छोड़ते समय भी पूजा करना नहीं भूलतीं। भगवान में उनकी प्रगाढ़ आस्था है। एक घटना ने आहूजा की आस्था भी उस मूर्ति के प्रति जाग्रत कर दी थी। तब से आहूजा दफ़्तर पहुँचते ही उसके सामने सिर झुकाना नहीं भूलता।हुआ यह कि एक बार मैम को कलकत्ता के लिए राजधानी ट्रेन पकड़नी थी। पूजा किए बिना जाना मैम के लिए कठिन था। लेकिन दो आवश्यक फाइलें निबटाने में उन्हें इतना समय लगा कि पूजा करने का अर्थ था–गाड़ी छूटना। गाड़ी छोड़ना उन्हें स्वीकार था, पूजा नहीं।उस दिन आहूजा विकल भाव से कभी मैम के कमरे में जाता, कभी बाहर कार तक। उसके चेहरे पर तनाव स्पष्ट था। जब तक मैम की पूजा समाप्त नहीं हुई, आहूजा अंदर-बाहर होता रहा। पूजा से निपट मैम बोली, “आहूजा, इतना परेशान क्यों हो... राजधानी मुझे लेकर ही जाएगी।"“मैम दस मिनट ही...” घड़ी देख आहूजा बोला।“पंद्रह मिनट का रास्ता है यहाँ से स्टेश्न का... ट्रेन मिलेगी।"और ट्रेन एक घंटा विलम्ब से गई थी। आहूजा सोचे बिना नहीं रह सका कि वह विलम्ब पूजा के कारण ही हुआ।दफ़्तर के दूसरे चपरासी जा चुके थे। चमन जग साफ करने लगा।चमन दबे पांव मैम के कमरे में घुसा। मैम तब तक आयी नहीं थीं। आहूजा को कमरे में न पाकर उसने राहत महसूस की। जग मैम की कुर्सी के पीछे स्टूल पर रख वह बाहर उन्हें रिसीव करने जाने के लिए मुड़ा तो उसे बाथरूम-कम-टॉयलेट से कुछ आहट-सी सुनाई दी।‘स्वीपर जगन अब आया है। इसको इतनी बार समझाया गया कि मैम के आने के समय वह बाथरूम में न घुसा करे। खुद भी मरेगा... मुझे भी मरवाएगा। मैम तो मैम... आहूजा देख लेगा तो जमीन-आसमान एक कर देगा।’बाहर का दरवाजा खोलने के लिए बढ़ता वह बाथरूम की ओर मुड़ गया। दरवाजा खोलते ही उसने जो देखा तो वह हत्प्रभ कुछ देर तक देखता ही रह गया। आहूजा संडास पर झुका हुआ था। उसके दाहिने हाथ में एक छोटा-सा डंडा था। डंडा संडास में डाल आहूजा उसे घुमा रहा था, यों जैसे संडास की सफाई कर रहा हो। क्षण भर तो चमन देखता रहा, फिर बोला, “सर, मैम आने वाली हैं। उन्हें रिसीव नहीं करेंगे।"“एक मिनट यार !...” आहूजा ने उसकी ओर देखे बिना खीझ भरा उत्तर दिया और बदस्तूर संडास में डंडा घुमाता रहा।चमन दरवाजा खोल बाहर निकल गया।
-- Roop Singh Chandelhttp://www.vaatayan.blogspot.com/wwwrachanasamay.blogspot.com

Sunday, 28 June 2009

अशोक आंद्रे

डर

आकाश में झांकना
उस झाँकने में दृश्य पैदा करना
फिर उस दृश्य में अपनों को ढूँढना
डर पैदा करता है ।

ज़मीँ उलझन देती है
इन उलझनों में घंटिया बजती हैं लगातार ,
पेड़ की ओर देखो तो
आकाश फिर दिखने लगता है ।

बंद कमरे में पसरे सन्नाटे के मध्य
खिड़कियों में फंसी झिर्रियों की तरह
एक आँख देखती है
समय के आवर्त को, जो
डर के नये मापदंड पैदा करती है ।

लेकिन उलझन का क्या करूं ?
पहाडों के बीच फंसा पानी भी तो
आकाश में सफेद रेशों का जाल बुनता है
जितना उसमें घुसो उतना गहरा होता जाता है
इसीलिए आकाश में झांकना डर पैदा करता है ।

अपने तो दिखते नहीं उस झाँकने में
आदमी तो भ्रमित होता रहता है
लेकिन उन रेशों की झनक में
हृदय की धडकनों की लय है
जिन्हें सुनने तथा देखने की ललक
आकाश में फिर झाँकने को मजबूर करती है ।

डर फिर भी आंखों के किसी कोने में
धंसता रहता है ,
जिसे जीवन की ललक पीठ की ओर धकेल देती है ।


(2)

उनके पाँव

जब से सिद्धांतों की सड़क
तैयार की है अपने ही अन्दर
एक खौफ़ लगातार बढ़ता जा रहा है
क्योंकि विकास के सारे रास्ते
उथली - संस्कृति की तरफ विकसित हो रहे हैं
उसके आगे के रास्ते गहरी ढलान की तरफ
धंसते दिखाई देते हैं ।

पहाड़ जहां कांपते हैं , हवा सरसरा जाती है
क्योंकि एक लहर धुंए की
यात्रा करने लगती है ,
और मनुष्य उस धुएँ में छिपा
अपने ही लोगों का करता है विनाश
जिसके निशान इन्हीं सड़कों पर देख
सहम जाते हैं आदिवासी
अंतस में उलझा आदिवासी संशय से देखता है -
इन सड़कों को ,

जो उनकी हरियाली को लीलने लगते हैं ,
जीवन बचाने के लिए ये आदिवासी
सभ्यों से दूर अपनी आकांक्षाओं में लीन
जंगल में बहते पानी में
ज़मीं छूती हरियाली में,रोपतें हैं

नन्हें बच्चों के पांवों के चिन्ह

ताकि उनके जंगलों में जीवन की श्रंखला स्थापित हो सके ,

और पहाडों के मन में सुकून की लहर

दौड़ती रहे ।

क्योंकि उनके लिए इन सड़कों का कोई महत्व नहीं है ,

उनके पाँव ही उनकी खुबसूरत सड़कें हैं ।

Saturday, 25 April 2009

अशोक आन्द्रे

कब से

कब से खामोश खड़ा मैं
आकाश की ओर घूर रहा हूँ
निष्ठुर समय पास खड़ा
अट्ठ्हास कर रहा है
क्योंकि पहाड़ पिघल रहे हैं
उनके आस - पास की हरियाली को
घोट कर पी लिया है किसी ने
इसको देखने के लिए अभिशप्त हैं हम ।
खेत सूख चलें हे कंक्रीट के पेड़ों तले
उन पर खड़ा व्यक्ति नारों से पेट भर रहा है ,

सिक्के चलते नहीं , दौड़ते हैं
उसके पीछे दौड़ते - दौड़ते
थक गया है आदमी
इस व्यवस्था का क्या किया जाए
अंधकार सुनामी की तरह धमकाता है
सिर्फ भूख से बिलखते
बच्चे ही आभास देते हैं
शायद जिन्दगी अभी ख़त्म नहीं हुई है

संदेह और भय के बीहडों में कुछ खोजने
को प्रेरित करते हैं चंद शब्द
फिर भी क्यूँ अट्टहास करता है समय ,
और मजबूर करता है आकाश घूरने को
आख़िर कब तक घूरते रहेंगे हम
अपने समय के आकाश को


छूने के प्रयास में

अंतस के गहन अंधेरे में
सिद्धांतो के विशालकाय महल खड़े हैं
जिन्हें मेरे पूर्वजों ने कभी शब्दशिल्पी बन
निर्मित किया था
जिनकी ऊचाइयां अब सांझ ढले
जमीन छूने को आतुर दिखाई देती हैं
इस सब के बावजूद उन्नत शब्द भी
चीटियों की तरह रेंगते हैं मेरे अन्दर , और
बौने स्वरूपों में परिवर्तित हो
मेरे सामने से गुजरते हुए अदृश्य हो जाती हैं ।
अपनी गंध छितराई हवा में जरुर छोड़ जाती हैं
जिन्हें मेरे हाथ छूने के प्रयास में
अचिन्हित डोरों में उलझ कर
झूलने लगते हैं
समझने में असमर्थ
धरती के जीव - जंतुओं के साथ
आकाश छूते पेडों की ऊचाइयां
सिर झुकाने लगती हैं ,
सिद्धांतो के उन विशालकाय महलों के आगे
जहां लोग अपनी अधूरी आस्था को
अपनी ही जातियों की अंध मान्यताओं की शिला पर
खंडित होते देखने के बावजूद
बनाते हैं विश्वास के ढूह
और देखता हूँ खज़िआये कुत्ते
सुबह से शाम तक अपनी कुंकुआती
ध्वनीसे चारों दिशाओं में भटकते हैं
और समय उनकी लार सा रिसता रहता है
लेकिन अंधेरे रहस्यों में
आत्माओं का आवागमन रहता है जारी
बीत रही जिन्दगी झांकना चाहती है
कुछ इस तरह जैसे पत्तलों को चाटता कुत्ता ।
समझ नहीं आता चाटूं उन पत्तलों को
या फिर मैं चला जाऊं कुत्तों के वजूद में
या ढूंढू सिद्धांतो के विशालकाय महलों में
खोई तमाम दुरात्माओं को
जिन्हें चट कर लिया है
इन विशाल शब्द शिलाओं ने ,
सिद्धांतों के विशालकाय महलों के कंगूरे
फिर - फिर छूने लगें हैं
अंतस में फैली घाटी को
शायद इसी भ्रम में से ही तो मनुष्य को
खोज कर स्थापित करना है मुझे
ताकि वे सिद्धांतो के विशालकाय
महलों में बसे आस्थाओं के साथ
दिग - दिगंत तक स्थापित रह सकें

Thursday, 16 April 2009

ashok andrey


Saturday, 7 March 2009

कहानी - अशोक आन्द्रे

अब आए हो

बाहर से अँधेरा उचक - उचक कर कमरे में झांक रहा था । कमरे में बल्ब की रोशनी बाहर बादलों के बीच कड़कड़ाती बिजली से बारबार मद्धम पड़ कर दम तोड़ने की कोशिश में तड़प रही थी ।

एक ठंडी साँस लेता हुआ सुरेश कुर्सी से उठ कर खिड़की के पास आ - खड़ा हुआ । सायं - सायं करता सन्नाटा , कुत्तों की चीख पुकार सुन कर घबराता हुआ किसी कोने में दुबकने की असफल चेष्ठा करने लगा। तभी बिजली की तेज कड़कड़ाहट के साथ बरसात की पहली बूँद धरती की कोख में प्रवेश कर गई । उस गुप्त नेह के आदान- प्रदान को कौन जान पाया होगा ?

अंधेरे में ही टटोलकर मेज से ख़त उठा लिया । पत्र काका का था । मन कहीं अन्दर तक प्रफुल्लित हो उठा। उन्ही की बदौलत तो उसके भविष्य का निर्माण हुआ था । घर में कोई भी तो नही चाहता था कि वह खूब पड़े । इस सबके पीछे आर्थिक पहलू से अधिक लालच मुख्य था । बाबू पैसे को दांत से पकड़ते थे , इसीलिये सारे कर्तव्य रिश्ते पैसे के सामने फीके पड़ जाते थे ।

पत्र में काका ने मिलने की तीव्र आकांक्षा व्यक्त की थी । काफ़ी समय से सेहत ख़राब चल रही थी उनकी । काका की याद कर मन भीग उठा ।दूसरे दिन ही अटेची में कपड़े सहेज तैयारी शुरू कर दी सुरेश ने । गांव जाने के लिए गाड़ी सुबह दस बजे के करीब छूटती है । सारी तैयारी करने के बाद कुछ समान खरीदने के लिए बाजार की तरफ चल दिया था ।

लौटा तो नौ बज रहा था । पड़ौसी हाथ में तार लिए उसका इन्तजार कर रहा था । देखते ही मन आशंका से कांप उठा । मन अतीत के अंधेरे जंगल की कंटीली झाडिओं में उलझ गया । काका के बहाने घर आने को लिखा था पिता ने ? क्या वास्तव में बाबू ने काका के लिए बुलाया था ?या सिर्फ अपने लिए । आज किसे काका के लिए इतना अपनत्व घुमड़ आया ?इन्ही काका के लिए तो जीवन भर जहर उगलते रहे थे । आज उसके जरिये कौन सा इंसानी रिश्ता कायम करना चाहते हैं । लगा की अन्तिम छ्णों में इस रास्ते से गुजर कर , काका की जमीन - जायदाद हथियाना चाहते हैं । बिना लोभ के तार का खर्च तो उन्हें स्वंय बिस्तर पर पहुँचा देता है ।

जिंदगी भर लोगों की लड़ाई लड़ते रहे थे काका । गरीबों की सेवा करना ही धर्म था उनका । पीड़ित होने के बावजूद अन्दर की थाह पाने की बजाय हर वक्त धर्म की दुहाई देते रहे , जिससे दलित कर व्यक्तित्व और अस्तित्व पर काबिज हो सके । आदमी कितना बौना हो जाता है जब उसके अस्तित्व में सिर्फ स्वार्थ के आकाश होते हैं ।

काकी की मृत्यु के बाद अकेले पड़ गए थे काका । अगर जिन्दा थे तो सिर्फ मुन्ना के लिए । उनके भविष्य की सारी सम्भावनाये मुन्ना पर टिक गईं थीं ।


अँधेरा कितना जालिम होता है। रास्ता - चलते सारे उजाले को कालिख पोतता चला जाता है । जहाँ जीवन ता -उम्र एक माचिस की तीली के लिए तड़पता , असहाय सा रह जाता है । कितना मुश्किल हो जाता है उसके इतिहास का आकलन करना । जब सारे शब्द काली स्याही में डूब आत्महत्या कर रहे हों उस वक्त , कैसा लगता है इसे आज तक नही जान पाया था सुरेश । अगर कुछ जाना भी तो सिर्फ काका से जो सूने आकाश को पथरायी आँखों से ताकते रहते थे । उनकी पनीली आँखों में अक्सर बाढ के गुजर जाने के बाद का दृश्य विद्यमान रहता था ..... खंडहरों का दृश्य ।

मुन्ना भी एक दिन राह चलती भीड़ में खो गया । और जीने के सभी मूल्य सूखे पत्तों की तरह आंधी के साथ बिखर गये थे ।


स्टेशन पर उतरते ही अपराध बोध से ग्रसित हो गया था सुरेश । हर दृश्य बदला - बदला नजर आ रहा था । मानो कोई कह रहा हो - अब आए हो ? भीड़ किसी षड़यंत्र में लिप्त नजर आ रही थी । तभी किसी ने पीछे से आकर कंधे पर हाथ रखा -कहाँ चलोगे बबूआ ।

सामने गाँव का हरिया खडा था । पूरी जिंदगी उसने तांगा चलाते ही काटी थी । उसको देखते ही फीकी मुस्कान से भर उठा था सुरेश । स्मृति की कंटीली झाडियों में फंसे रहकर भी हाथ का इशारा कर दिया था ।

गाँव की अपनी ही संस्कृति होती है । जहाँ हर आदमी सामूहिक जिंदगी जीता हे । ऊपर से देखने में भोला लगता है , लेकिन ...... अन्दर की कोमलता कंटीली तारों से घिरी , दरवाजे की चौखट पर खड़े -खड़े ही कैक्टासी रिश्तों का विस्तार करती है ।

तभी यादों का एक बुलबुला तडाक से फूट पड़ता है और उसके सामने काका का स्नेहासिक्त चेहरा मुस्कुरा उठता है । पर उस मुस्कराहट में भी दर्द की एक फांस टीसती रहती है । पता नही किसके इन्तजार में बुढापा टेढी - मेढी लकीरों के रास्ते उनके चेहरे से गुजरता हुआ चला गया था । आख़िर उम्र और जीने के अरमान में कोई अनुपात क्यों नही होता है ?

सामने से एक बच्चा तेजी से भागता हुआ निकल जाता है । उसकी तरफ देखकर सुरेश बरबस ही मुस्कुरा उठता है । तभी तेजी से बनता - बिगड़ता एक बिम्ब उस मुस्कराहट के बीच उभरता है । आज से चौदह साल पहले की बात है । ठीक उसी बच्चे की उम्र का था वह तब-बंधन हीन- उन्मुक्त । यह घटना भी करीब उसी समय की है । माँ ने काका के लिए खाना देकर भेजा था । काका को खाना देकर हवेली के ठीक बीचों - बीच खेलने लग गया था वह । अकस्मात ही काका चीख पड़े थे - मन्नू ।

सहम कर ठिठक गया था । अन्दर तक कांप उठा था । उनकी चीख के साथ ही सन्नाटा पंख फड़फड़ा कर आँगन के पीपल पर बेताल की तरह लटक गया था ।

चिल्लाने के उपरांत काका अनायास ही रो पड़े थे । और उठकर मेरे पास आए थे । कहने लगे - मन्नू ! तू नही जानता की तूने अनजाने में क्या कर डाला ? और गले लगा कर जोर से फफक पड़े थे ।

हिचकियों के बीच में सिर्फ़ इतना ही सुन सका था - मन्नू नाराज है क्या ? तुझे क्या मालुम मैं , किसका इन्तजार करता रहा हूँ । देख यहाँ पर अभी - अभी तेरी काकी और मुन्ना बैठे थे । तेरी वजह से चले गए ।

आज इस घटना को समझ सकता है सुरेश । लेकिन क्या उनके विश्वाश को वह फिर से स्थापित कर सका ? सिर्फ़ इतना जाना कि जब कोई नही होता है तब आदमी स्वंम को छलता है ।

जिंदगी जीने का उनका तरीका और उससे जुड़ी फिलासफी , समाज से जुड़े स्वार्थी संदर्भो से सर्वथा भिन्न थी । किसी का दुख देखकर वे मोम की तरह पिघल उठते थे । विधवा कमली के साथ अत्याचार को सुनकर सबसे पहले वे ही सहायता को आए थे । किसी के साथ हुए अन्याय को सहना सबसे बड़ा पाप समझते थे काका । पूरे गाँव को ललकारा था उस वक्त । तब से आज तक कमली और उसकी छोटी बच्ची को अपने घर में ही शरण दे रखी है ।


गाँव सन्नाटे में आ गया था उस दिन और चौपाल पर पूरा गाँव सिमट आया था । और बाबू ? गाँव के मुखिया बनकर भर्त्सना कर रहे थे । उन्हें आशंका थी की कहीं कमली तथा उसकी बेटी मिलकर काका की संपत्ति न हड़प लें । चाह कर भी काका की सहायता न कर सका था सुरेश । उम्र आड़े हाथों आ गई थी उसके सामने । कितना बौखलाया था माँ के सामने । भारतीय नारी की तरह गूंगी रह गई थी माँ । क्या पत्नितव की मर्यादा से उठकर नारी के लिए जीना सम्भव नहीं है ?

उस दिन से काका व्यथित रहने लगे थे । गाँव से नाता ही टूट गया था । अपने अस्तित्व को आँगन के बीचों -बीच समेट कर स्थिर कर लिया था उन्होंने । आँखे सूखी नदी की तरह शांत होकर ग्लेशियर की तरह जमी रह गई थी ।

तांगा घर के करीब पहुँच गया था । अचानक ही टिड्डी दल की तरह बच्चों ने टाँगे को घेर लिया था । बच्चों की आँखों में शरारत की जगह अनुत्तरित प्रश्न थे । जी में आया की एक बार पूछ लूँ काका के बारे में किन्तु आवाज गले में ही घुमड़ कर रह गई ।

गली के दायें नुक्कड़ पर उसका घर था । उसका घर या बापू का घर ?..... जहाँ स्वार्थ का गिद्ध बोल रहा था । बायीं और काका की हवेली थी । निस्पृह ..... करूणा बिखराती ।

पैर काका की हवेली की तरफ़ मुड़ गए । जहां हर वक्त सन्नाटा अबूझ पहली की तरह व्याप्त रहता था वहां आज भीड़ हवेली के अंदर -बाहर एक दुसरे की तरफ़ आखों में ढ़ेर सारे प्रश्र लिए दिखाई दे रही थी । उन प्रश्रों के बीच काका की लाश अन्तिम यात्रा के लिए शायद उसी का इन्तजार कर रही थी । स्तब्ध रह जाता है सुरेश । फिर चौंक उठता है । लगा काका पूछ रहे है-'अब आए हो ?'

एक तेज चीख के साथ लाश के बिल्कुल करीब पहुंच जाता है । आंसू बाढ़ की मानिंद बह उठते हैं । तभी भीड़ में से उठकर दो-चार लोग उसे एक तरफ़ ले आते हैं । बिना आधार के सांत्वना देने लगते हैं । भीड़ को देख उसका पूरा व्यक्तित्व बेबसी से कांपने लगता है । यह वही भीड़ थी जो हमेशा काका की खिलाफ़त में तुरुप चाल चलकर विरोध के झंडे खड़े करती थी । लगा कि मौत को सन्नाटे की बजाय भीड़ कुछ ज्यादा ही पसंद है अन्यथा इस भीड़ का काका से क्या सरोकार है ।

बाबू को कमरे से बाहर आते हुए देखता हूँ । किसी व्यक्ति से बातें करने लगे थे । धीरे से खिसकता हुआ करीब पहुँचता हूँ और बाबू को फुसफुसाते हुए सुनता हूँ । काका की प्रापर्टी के बारे में बातचीत कर रहे थे । इस वक्त काका की अन्तिम यात्रा के समय जब उनकी आत्मा की शान्ति के लिए कुछ करना चाहिए था , ऐसी बातें सुनकर उसका मन वितृष्णा से भर उठा । फिर भी बाबू के पैर छुए , तो पहले वह चोंके और फिर अवहेलना भरे स्वर में कहा -अब आए हो ?

उसकी अंतरात्मा एक भूल - भुलैया में तड़पती हुई दौडने लगती है । दो आवाजें गहरी होकर गूंजने लगती हैँ -अब आए हो !

दोनों आवाजों के अन्तर को पहचानने का वह प्रयत्न करता है। दोनों में ही एक मलाल छुपा हुआ है देर से आने पर । एक शिकायत उभरती है , किंतु भावना की तलहटी में और यथार्थ में , ऊंचाई और निचाई का गहरा अन्तर है । स्वर्ग की पवित्रता और नर्क की अपवित्रता का बोध है। एक आवाज में प्यार है , अपनत्व है और है देर से आने की शिकायत । चाहे वे शब्द मूक रूप में उभरे थे ,एक लाश अदृश्य में फुसफुसाई थी ।

दूसरी आवाज उसके बापू की थी जिसमें सिर्फ स्वार्थ का स्वर हानि का गिला और देर से आने की शिकायत थी । उसे लगता है की उसका अपना जनक नर्क का कानूनगो है । उसे रिश्ते , स्नेह और जीवन से कोई सरोकारनहीं है । सिर्फ मुनाफे का समीकरण है ।

अचानक वह जाग सा उठता है । काका की मृत देह के चारों तरफ सांपो को कुंडली मारे बैठे देखता है । चीखना चाहता है कि जीते जी बहूत सताया तुमने । अब तो डसना बंद करो ।

अर्थी लेकर लोग चलने लगते हैँ। शोर में सिर्फ उसे अपनी रुलाई सुनाई पड़ती है । लगता है कि बाकी लोग सिर्फ एक बोझ उठाकर दूर फेंकने जा रहे हैँ जिससे निर्भय होकर हवेली पर कब्जा कर सकें ।

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